Friday, March 26, 2010

प्रार्थना


बनफूल की सुवास पी 
मदमस्त समीर
कितना अधीर 
चढ़ती खुमारी 
चढ़ती ही जाती 
लहराता मादकता में यायावर 
सहलाता ठंडी श्वासों से 
अंग उमंग 
और तभी पुलकन घटती ....

टुकुर टुकुर निहारते तारे ये सारे 
गा रही नींद कोमल स्वर में
घट रहे स्वप्न कितने मधुर 
मीठे मीठे , जागे जागे 
ज्यो खनके घुंघरुओं  की छुन छुन 
बेबस ये गुन गुन .....
गा रहे भाव गीत प्यारे
छुप छुप कर झींगुर , कितने सारे...

है अब अद्भुत आलोक, नृत्य में मृत्यु का लोक 
कैसा सुखद एहसास है , अब वह मेरे पास है 
आंदोलित अश्रु  सरिता , घट रहा मधुमास 
शुन्य जन्मा गर्भ में , अप्रयास .......

गा रहे श्रंगार  , भाषा संग विचार 
झरी .... निर्झर चेतना 
खिल उठी प्रार्थना ,
आनंद का कलरव,
आनंद की फुहार
निर्विकार ....
निर्विकार.....


2 comments:

  1. Dear Satyendra,

    A very nice and indepth poem. You have covered all aspects of life and life forms. Life & Death, Cause and effect go hand in hand.

    keep it up.

    Naveen Mathur

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