बनफूल की सुवास पी
मदमस्त समीर
कितना अधीर
चढ़ती खुमारी
चढ़ती ही जाती
लहराता मादकता में यायावर
सहलाता ठंडी श्वासों से
अंग उमंग
और तभी पुलकन घटती ....
टुकुर टुकुर निहारते तारे ये सारे
गा रही नींद कोमल स्वर में
घट रहे स्वप्न कितने मधुर
मीठे मीठे , जागे जागे
ज्यो खनके घुंघरुओं की छुन छुन
बेबस ये गुन गुन .....
गा रहे भाव गीत प्यारे
छुप छुप कर झींगुर , कितने सारे...
है अब अद्भुत आलोक, नृत्य में मृत्यु का लोक
कैसा सुखद एहसास है , अब वह मेरे पास है
आंदोलित अश्रु सरिता , घट रहा मधुमास
शुन्य जन्मा गर्भ में , अप्रयास .......
गा रहे श्रंगार , भाषा संग विचार
झरी .... निर्झर चेतना
खिल उठी प्रार्थना ,
आनंद का कलरव,
आनंद की फुहार
निर्विकार ....
निर्विकार.....